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संसदीय गौरव के सात दशकों में लोकसभा अध्यक्षों की गरिमामय यात्रा

पार्लियामेंट्री सिस्टम की नींव रखने वाले लोकसभा के जनक 'गणेश वासुदेव मावलंकर' से लेकर नए भारत के 'ओम बिरला' तक संसद के स्वरूप और संवैधानिक परंपराओं का सफर।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 15 मई का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1952 में गणेश वासुदेव मावलंकर ने स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था। उन्हें 'लोकसभा के जनक' के रूप में जाना जाता है क्योंकि उन्होंने उस समय सदन की नियमावली और संस्थागत ढांचे का निर्माण किया जब भारत अपनी संसदीय परंपराओं के शैशव काल में था। मावलंकर के बाद एम. अनंतशयनम आयंगर (1956-1962) ने इस जिम्मेदारी को संभाला और उनके कार्यकाल में सदन की गरिमा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास किया गया। इसके उपरांत सरदार हुकम सिंह (1962-1967) और नीलम संजीव रेड्डी (1967-1969) ने अध्यक्ष पद की निष्पक्षता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ नीलम संजीव रेड्डी ने तो पद ग्रहण करते ही अपनी राजनीतिक पार्टी से इस्तीफा देकर एक नई मिसाल पेश की थी।

सत्तर के दशक में गुरदयाल सिंह ढिल्लों (1969-1975) और बाली राम भगत (1976-1977) ने चुनौतीपूर्ण राजनीतिक परिस्थितियों में सदन का संचालन किया जिसके बाद नीलम संजीव रेड्डी एक बार फिर 1977 में अल्प समय के लिए अध्यक्ष बने और उनके बाद के.एस. हेगड़े (1977-1980) ने इस प्रतिष्ठित कुर्सी की शोभा बढ़ाई। अस्सी के दशक की शुरुआत में बलराम जाखड़ (1980-1989) ने लगातार दो कार्यकालों तक अध्यक्ष रहकर एक लंबा कीर्तिमान स्थापित किया और उनके समय में ही कई आधुनिक संसदीय समितियों का गठन हुआ। उनके बाद रवि राय (1989-1991) और शिवराज पाटिल (1991-1996) ने गठबंधन की राजनीति के दौर में अत्यंत कुशलता और संवैधानिक नैतिकता के साथ विभिन्न विचारधाराओं के सांसदों के बीच समन्वय स्थापित करने का सराहनीय कार्य किया।

नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में पी.ए. संगमा (1996-1998) और जी.एम.सी. बालयोगी (1998-2002) ने अध्यक्ष पद को एक नई ऊर्जा प्रदान की और तकनीकी के समावेश को बढ़ावा दिया जिसके बाद मनोहर जोशी (2002-2004) और दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी (2004-2009) ने सदन की कार्यवाही को जनता के अधिक करीब लाने का प्रयास किया। सोमनाथ चटर्जी का कार्यकाल विशेष रूप से इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर संविधान की भावना को सर्वोपरि रखा था। इसके बाद भारत को मीरा कुमार (2009-2014) के रूप में पहली महिला अध्यक्ष मिलीं और उनके बाद सुमित्रा महाजन (2014-2019) ने सदन की बागडोर संभालकर महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया। वर्तमान में ओम बिरला (2019 से अब तक) इस ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिनके नेतृत्व में संसद ने न केवल नए भवन में प्रवेश किया है बल्कि रिकॉर्ड कार्य-उत्पादकता के साथ संविधान की आत्मा को सदन की कार्यप्रणाली में उतारने का सफल प्रयास किया जा रहा है।

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