

40 साल के करियर में पहली बार ऐसा संकट
Apple के सीईओ टिम कुक ने हाल ही में एक बड़ी बात कही। अपने चार दशक लंबे करियर में उन्होंने कभी सप्लाई चेन को इस हद तक हिलते नहीं देखा, जितना आज मेमोरी चिप्स की कीमतों की वजह से हो रहा है। यह कोई मामूली बयान नहीं है। जब दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी का मुखिया ऐसा कहे, तो समझ लेना चाहिए कि मामला सतही नहीं है। इसी संकट का असर हाल में MacBook और iPad की कीमतों में साफ दिखा। कुछ मॉडल ₹10,000 तक तो कुछ लगभग ₹1 लाख तक महंगे हो गए। खबरें यह भी हैं कि आने वाला iPhone 18 और फोल्डेबल iPhone Ultra कहीं ज़्यादा ऊंची कीमत पर लॉन्च हो सकते हैं।
RAM की किल्लत की जड़ कहां है
कहानी की शुरुआत बीते साल अक्टूबर से मानी जा रही है, जब OpenAI ने दुनिया की प्रमुख चिप निर्माता कंपनियों से भारी मात्रा में RAM वेफर्स और अन्य कच्चा माल खरीदना शुरू किया। मकसद था बड़े पैमाने पर AI डेटा सेंटर खड़े करना। इसके पीछे तर्क यह है कि आने वाले वर्षों में AI इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग इतनी बड़ी होगी कि कंपनियां अभी से मोटी रकम लगाकर संसाधन जुटाने में लगी हैं, भले ही कई AI कंपनियां अभी मुनाफे में न हों।
दिलचस्प यह है कि इस संकट के लिए ज़िम्मेदारी को लेकर उद्योग में आरोप-प्रत्यारोप भी चल रहा है। अमेरिका में SK Hynix, Micron और Samsung जैसी बड़ी मेमोरी कंपनियों के खिलाफ मूल्य में जानबूझकर बढ़ोतरी करने के आरोप में मुकदमा तक दर्ज हुआ है। दूसरी ओर, ये कंपनियां खुद सफाई देती हैं कि वर्षों तक Apple जैसी बड़ी कंपनियों ने कम कीमत पर सप्लाई ली, जिससे उन्हें नई फाउंड्री और क्षमता में निवेश करने का मौका ही नहीं मिला। अब जब मांग अचानक बढ़ी, तो सप्लाई पीछे रह गई।
हर डिवाइस पर असर, बजट सेगमेंट सबसे ज़्यादा प्रभावित
इसका सीधा असर बाज़ार में दिख रहा है। जो फोन कभी ₹15,000-₹18,000 में AMOLED स्क्रीन और अच्छे प्रोसेसर के साथ मिल जाते थे, आज उसी क्वालिटी के लिए कहीं ज़्यादा खर्च करना पड़ रहा है। बजट सेगमेंट में 4G चिपसेट और 4GB रैम जैसी पुरानी तकनीकों की वापसी हो रही है, यानी कंपनियां कीमत थामने के लिए क्वालिटी से समझौता कर रही हैं। यही स्थिति गेमिंग कंसोल, लैपटॉप, PC कॉम्पोनेंट्स और यहां तक कि स्मार्ट टीवी सेगमेंट में भी दोहराई जा रही है, क्योंकि इनमें भी RAM और स्टोरेज की अहम भूमिका होती है।
आगे क्या? 2027 तक स्थिरता की उम्मीद
उद्योग जगत का अनुमान है कि 2027 से पहले कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद कम है, और स्थिरता का मतलब गिरावट नहीं बल्कि मौजूदा ऊंचे स्तर पर टिके रहना है। कुछ कंपनियां चीन की CXMT और YMTC जैसी वैकल्पिक सप्लाई चेन की तरफ भी देख रही हैं, लेकिन भू-राजनीतिक जटिलताओं और सीमित छूट के चलते इससे बड़ी राहत मिलने की संभावना कम ही है।
यह संकट सिर्फ टेक कंपनियों की समस्या नहीं, बल्कि सीधे उपभोक्ता की जेब पर असर डालने वाला है।