

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनजर चंदौली जिले की मुगलसराय विधानसभा सीट पर राजनीतिक हलचल बेहद तेज हो गई है। ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से पूर्वांचल की सबसे चर्चित सीटों में शुमार इस विधानसभा क्षेत्र में टिकट के दावेदारों ने अभी से अपनी-अपनी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। यह सीट इस समय पूरे प्रदेश की निगाहों में है, क्योंकि यहां भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज कर अपनी हैट्रिक का दावा कर रही है। भाजपा का मुख्य भरोसा राज्य सरकार के विकास कार्यों, सुदृढ़ सांगठनिक ढांचे और डबल इंजन सरकार की लोककल्याणकारी योजनाओं पर है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी जनता से जुड़े बुनियादी मुद्दों, जैसे सड़क चौड़ीकरण, व्यापारियों की समस्याओं, किसानों-मजदूरों की बदहाली और युवाओं की बेरोजगारी को आधार बनाकर सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश में जुटी है।
चुनावी रणभेरी बजने से पहले ही विभिन्न राजनीतिक दलों के भीतर संभावित चेहरों को लेकर जोड़-तोड़ और कयासबाजी का दौर चरम पर पहुंच चुका है। सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर से वर्तमान विधायक रमेश जायसवाल की मजबूत दावेदारी के साथ ही सूर्यमुनि तिवारी, डॉक्टर के. एन. पांडेय और संतोष कुमार गुप्ता की जमीनी सक्रियता भी उन्हें रेस में बनाए हुए है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी में मुख्य रूप से पिछले चुनाव के उम्मीदवार और समाजवादी युवजन सभा के प्रांतीय महासचिव चंद्रशेखर यादव, सिद्धांत जायसवाल और सपा महिला सभा की जिला कमान संभाल रहीं गार्गी सिंह पटेल टिकट पाने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। इसके समानांतर, लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव जितेंद्र कुमार गुप्ता वैश्य के नाम पर भी पार्टी के अंदरूनी गलियारों में विचार-विमर्श की खबरें हैं। इसी गहमागहमी के बीच, क्षेत्र का राजनीतिक माहौल उस समय और अधिक गरमा गया जब लगभग एक हजार से ज्यादा अल्पसंख्यक समुदाय के कार्यकर्ताओं ने चंदौली से सपा सांसद वीरेंद्र सिंह के निवास स्थान पर डेरा डाल दिया और स्थानीय नेता औसफ अहमद गुड्डू को उम्मीदवार बनाने की पुरजोर वकालत की। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सांसद ने कहा कि प्रत्याशी का अंतिम फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा ही लिया जाएगा।
इस त्रिकोणीय और बहुकोणीय मुकाबले को धार देने के लिए अन्य दल भी मैदान में डटे हुए बसपा की ओर से वर्ष 2022 के प्रत्याशी और वर्तमान मुगलसराय प्रभारी इरशाद अहमद 'बबलू' क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं और उन्हें 2027 के चुनाव का प्रमुख संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस खेमे से वर्ष 2022 के प्रत्याशी छब्बू पटेल भी क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं, हालांकि उनकी ओर से आगामी चुनाव लड़ने की कोई स्पष्ट घोषणा अभी सामने नहीं आई है। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) जैसी शक्तियों की हलचल भी मुख्य दलों के पारंपरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।
अगर इस विधानसभा क्षेत्र की जनसांख्यिकी और सामाजिक ताने-बाने की बात करें, तो यहाँ करीब 86 प्रतिशत हिंदू आबादी और लगभग 13 से 14 प्रतिशत मुस्लिम आबादी निवास करती है। जातीय समीकरणों के लिहाज से करीब 4 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर लगभग 47 हजार मुस्लिम मतदाता, 40-40 हजार वैश्य और यादव मतदाता, 38 हजार दलित मतदाता तथा 34 हजार क्षत्रिय मतदाताओं के अलावा बिंद, चौहान, पटेल, मौर्य, राजभर और मल्लाह बिरादरी के लोग भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। स्थानीय विश्लेषकों के अनुसार, मुगलसराय की कुल आबादी में 60 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 40 प्रतिशत हिस्सा शहरी है। शहरी क्षेत्रों में व्यापारिक वर्ग का अच्छा-खासा प्रभाव है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के पक्ष में एकजुट नजर आता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने पिछले दो चुनावों में व्यापारी वर्ग से जुड़े चेहरे को मैदान में उतारकर जीत दर्ज की थी। क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए भाजपा जहां बूथ स्तर पर संगठन को जमीनी रूप से सक्रिय करने की तैयारियों में अभी से जुट गई है, वहीं स्थानीय स्तर पर वर्तमान विधायक रमेश जायसवाल की जनता के बीच निरंतर मौजूदगी और सीधा जुड़ाव भी पार्टी के पक्ष में एक बड़ा संबल माना जा रहा है।
आगामी चुनाव में विपक्षी दल सपा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी 'पीडीए' फॉर्मूले को बड़ी प्राथमिकता देते हुए मजबूत प्रत्याशी को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही हैं, जिससे मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है। चूंकि साल 2017 और 2022 के चुनावों में जीत का अंतर बड़ा नहीं होने के कारण इस सीट को एकतरफा बिल्कुल नहीं माना जा सकता। पर भाजपा इस बार वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी करने के उद्देश्य से अधिक मजबूती से रणनीति तैयार कर रही हैं और हर वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल भारत के आत्मनिर्भर विज़न और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व में उत्तर प्रदेश अब एक पारंपरिक व्यवस्था से आगे बढ़कर देश के सबसे आधुनिक तकनीकी और औद्योगिक पावरहाउस के रूप में स्थापित होने के लिए पूरी तरह संकल्पित है, बहरहाल, 2027 के इस दिलचस्प चुनावी संग्राम में जीत का ऊँट किस करवट बैठेगा, इसका वास्तविक फैसला तो मतगणना के बाद आने वाले नतीजे ही तय करेंगे।