

झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव ने राज्य के सियासी पारे को गरमा दिया है। आगामी 18 जून को होने वाले मतदान के लिए राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। इस बार मैदान में तीन उम्मीदवारों—झामुमो से बैद्यनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा और भाजपा (एनडीए) समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी—के होने से मुकाबला त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प हो गया है। रांची में सभी दलों के प्रभारियों, पर्यवेक्षकों और रणनीतिकारों का जमावड़ा शुरू हो चुका है और हर एक वोट को सुरक्षित करने की कवायद तेज है। प्रशासन भी इसे लेकर पूरी तरह अलर्ट है और खुफिया विभाग, स्पेशल ब्रांच व इंटेलिजेंस ब्यूरो को सक्रिय कर दिया गया है ताकि किसी भी तरह की खरीद-फरोख्त पर नजर रखी जा सके।
इस चुनाव में एनडीए गठबंधन पूरी तरह एकजुट और मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है। भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के पास वर्तमान में 24 विधायकों का मजबूत आधार है, जिसमें भाजपा के 21, आजसू के 1, जेडीयू के 1 और लोजपा-रामविलास के 1 विधायक का पूर्ण समर्थन शामिल है। जीत के आवश्यक जादुई आंकड़े यानी 28 वोटों तक पहुंचने के लिए उन्हें मात्र 4 और वोटों की दरकार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नाथवानी के लिए यह दूरी तय करना मुश्किल नहीं है क्योंकि उनके सभी दलों के नेताओं और कई विधायकों के साथ बेहद मधुर और पुराने व्यक्तिगत संबंध हैं। इतिहास गवाह है कि साल 2008 में भी परिमल नाथवानी ने झामुमो और कांग्रेस के गठबंधन के बावजूद विपरीत परिस्थितियों में जीत दर्ज की थी, तब झामुमो के ही कई विधायकों ने उनका समर्थन किया था। इस बार भी भाजपा के मजबूत रणनीतिक समर्थन और नाथवानी के व्यक्तिगत संपर्कों के कारण उनकी जीत की संभावनाएं काफी प्रबल दिखाई दे रही हैं।
दूसरी तरफ, विपक्षी इंडिया गठबंधन के खेमे में सब कुछ सामान्य नहीं दिख रहा है। गठबंधन के पास कुल 56 विधायक जरूर हैं, जिससे दोनों सीटें जीती जा सकती हैं, लेकिन आंतरिक तल्खी और अविश्वास ने उनकी राह मुश्किल कर दी है। परिमल नाथवानी के नामांकन प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस ने अकेले ही पुरजोर विरोध किया, जिससे सहयोगी दल झामुमो, राजद और माले ने पूरी तरह दूरी बनाए रखी। राजद और माले के विधायकों ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताते हुए कहा कि उम्मीदवार चयन से पहले कांग्रेस ने उनसे कोई संवाद नहीं किया और न ही विरोध प्रदर्शन की कोई सूचना दी। इससे पहले असम और पश्चिम बंगाल चुनावों में भी झामुमो और कांग्रेस के बीच कड़वाहट सामने आ चुकी है। भाजपा के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी कांग्रेस के इस विरोध को मुद्दाविहीन प्रदर्शन करार दिया।
झामुमो के पास 34 विधायक हैं और वह अपने उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 30 वोट अपने पाले में रखना चाहता है ताकि किसी वोट के रद्द होने का खतरा न रहे। झामुमो की इस सुरक्षित रणनीति के कारण सहयोगी कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा के लिए वोटों का गणित थोड़ा पेचीदा हो गया है और कांग्रेस को अब अपनी जीत के लिए अतिरिक्त या निर्दलीय विधायकों के भरोसे रहना होगा। विपक्ष की इसी आंतरिक कलह और झामुमो-कांग्रेस के बीच बढ़ते मतभेदों का सीधा सियासी लाभ एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी को मिलता दिख रहा है। नाथवानी के समर्थक और रणनीतिकार एक-एक विधायक से संपर्क साधकर बड़ी जीत दर्ज करने की योजना पर मुस्तैदी से काम कर रहे हैं।
इस बेहद संवेदनशील चुनाव को देखते हुए चुनाव आयोग ने भी वोटिंग को पारदर्शी बनाने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं। क्रॉस वोटिंग रोकने के लिए सभी विधायकों को अपने अधिकृत पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाना अनिवार्य होगा, ऐसा न करने पर मत अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। इसके साथ ही सभी विधायकों को चुनाव आयोग द्वारा दिए गए विशेष मार्कर पेन से ही वोट देना होगा, अन्यथा वोट रद्द हो जाएगा। पहली बार चुने गए नए विधायकों को विशेष ट्रेनिंग भी दी जा रही है ताकि मानवीय भूल के कारण कोई वोट बेकार न हो। 18 जून को होने वाला यह मुकाबला महज दो सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि यह राज्य की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेगा जहां एनडीए के मजबूत समर्थन और अपने बेहतरीन सियासी समीकरणों के दम पर परिमल नाथवानी एक बार फिर बड़ा उलटफेर करने की स्थिति में दिख रहे हैं।