विलंबित टिप्पणी अस्वीकृत टिप्पणी है

मणिपुर राज्य में हुई घटना पर बड़े-बड़े नेता और प्रशाशन की चुप्पी देश के लिए चिंताजनक है।
विलंबित टिप्पणी अस्वीकृत टिप्पणी है

यह कथन कि "राजनेता जितना संभव हो सके मुद्दों की अनदेखी करते हैं" एक सामान्यीकरण है और यह सभी राजनेताओं पर समान रूप से लागू नहीं हो सकता है। हालाँकि, यह सच है कि कुछ मामलों में , राजनेताओं को विभिन्न कारणों से कुछ मुद्दों की अनदेखी करते हुए देखा जा सकता है | अक्सर ऐसा पाया जाता है बड़े - बड़े राजनेता और लीडर्स देश में उबलते हुए कई मुद्दों पर टिप्पणी करने से बचते है।  वो मुद्दों से तब तक बचते हैं जब तक कोई ऐसा हादसा नहीं हो जाता जहाँ वह मज़बूर हो जाते हैं और उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचता सिवाए इसके की वो समाज में बनी अपनी पारदर्शी इमेज को बचा सके।

मणिपुर राज्य में हुई घटना पर बड़े-बड़े नेता और प्रशाशन की चुप्पी देश के लिए चिंताजनक है।मणिपुर में बढ़ती हुई हिंसा के बाद भी किसी राजनेता ने खुल के उस पर अपने विचार व्यक्त नहीं करे।   बहुत समय पहले से ही आपस की लड़ाई में महिलाओं को निशाना बनाना एक जटिल और परेशान करने वाली घटना है जिसकी जड़ें विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारकों पर आधारित हैं।    मणिपुर में महिलाओं को नग्न घुमाने की घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी के बाद, कांग्रेस ने गुरुवार को पूर्वोत्तर राज्य पर "अपनी चुप्पी तोड़ते हुए" राजस्थान और छत्तीसगढ़ का उल्लेख करके उन पर राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि यह "बहुत देर हो चुकी है" " और "केवल शब्दों से अब काम नहीं चलेगा"। मोदी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि 1800 घंटे से अधिक की ''समझ से बाहर और अक्षम्य चुप्पी'' के बाद आखिरकार प्रधानमंत्री ने मणिपुर के मुद्दे के लिए अपने ३० सेकंड खर्च कर दिए है।

अक्सर अन्य मुद्दों को प्रमुखता देते हुए मणिपुर राज्य में हो रही हिंसा और सांप्रदायिक आक्रोश के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश करी गयी पर जब बात इस नौबत पर आ गयी की दो महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ जिसने मानवता को अंदर तक झंझोर कर रख दिया तब उनका ध्यान इस राज्य पर पड़ा और एक एक कर के राजनेता अपनी अपनी चुप्पी इस पर तोड़ने लगे हैं पर ध्यान देते की बात ये है की इतने दिन से जलते हुए देश के एक अभिन्न राज्य के बारे मेंटिप्पणी करने के लिए शायद दो महिलाओं के साथ दुर्गति होने की देर थी। दो टूक बोले हुए शब्द या ट्वीट इस घिनौनी हिंसा से देश को कभी नहीं उभार सकत। 

अक्सर कहा जाता है की " जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड" यानी की " न्याय में देरी न्याय न मिलने के समान है " ठीक उसी तरह इतनी देर से इस मुद्दे पर चुप्पी तोडना भी अस्वीकार है। किसी भी देश के लिए ये अत्यंत महत्वपूर्ण है की वहां के राजनेता जो उस सत्ता को चला रहे हैं वो देश मेंचल रही सब घटनाओं पर सिर्फ टिप्पणी ही न करें बल्कि उन पर सख्त कार्यवाही भी करी जाए। 

इस हादसे के बाद एक बहु चर्चित अखबार ने टिप्पणी करी की "56 इंच का छेद करने में दर्द और शर्मिंदगी को 79 दिन लग गए"।।  मणिपुर में हो रहे इस दर्दनाक वाकये को जो लगभग ७९ दिन से चल रहा था उसपे प्रकाश डालने के लिए दो महिलाओं को अपना सब कुछ कुर्बान करना पड़। सिर्फ वो दो महिलाएं ही नहीं बल्कि पूरे देश पूरी दुनिया की महिलाएं इस घटना से शर्मशार हुई है।  ये देश के लिए शर्मिंदगी की बात है और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर देश की छवि को आहात पहुँचता है। यह एक नंदनिया घटना है।

राजनीती को चलाने के बहुत से पहलु है।  कई बार ऐसा होता की अपने या अपने राजनीतिक दल के निजी फायदे के लिए राजनेता ऐसा मुद्दों पे टिप्पणी करने से बचते हैं और चुप्पी साध लेते है। ऐसा करने की बहुत सी वजह हो सकती है जिसमे से सबसे प्रमुख वजह निम्नलिखित हैं :

1)      राजनीतिक प्राथमिकताएँ:  राजनेताओं के पास अक्सर संबोधित करने के लिए कई मुद्दे होते हैं, और वे उन मुद्दों को प्राथमिकता दे सकते हैं जो उनके राजनीतिक एजेंडे के साथ संरेखित होते हैं या जिन्हें अधिक महत्वपूर्ण सार्वजनिक समर्थन प्राप्त होता है। इससे यह धारणा बन सकती है कि वे अन्य कम लोकप्रिय या विवादास्पद मुद्दों की अनदेखी कर रहे हैं।

2)      पुनर्निर्वाचन संबंधी चिंताएँ:  राजनेता अपने पुनर्निर्वाचन की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं जो उनके मतदाता आधार से संबंधित हैं। ऐसा करने पर, वे संभावित मतदाताओं को अलग-थलग करने से बचने के लिए अधिक विभाजनकारी मुद्दों को कम महत्व दे सकते हैं या उन पर रुख अपनाने से बच सकते हैं।\

3)      विशेष रुचि और पैरवी: शक्तिशाली हित समूह या पैरवी करने वाले राजनेताओं के एजेंडे को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे वे व्यापक जनता के लिए उनके महत्व की परवाह किए बिना, दूसरों पर कुछ मुद्दों को प्राथमिकता दे सकते हैं।

4)      सीमित संसाधन: राजनेताओं के पास सीमित समय, कर्मचारी और संसाधन हो सकते हैं, जिससे हर मुद्दे को व्यापक रूप से संबोधित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

5)      जागरूकता की कमी: कुछ राजनेता वास्तव में कुछ मुद्दों या उनके महत्व से अनभिज्ञ हो सकते हैं, जिससे अनजाने में उपेक्षा हो सकती है।

6)      विवाद का डर: कुछ मुद्दों को संबोधित करने से विवाद या प्रतिक्रिया हो सकती है, और राजनेता एक अनुकूल सार्वजनिक छवि बनाए रखने के लिए संभावित संघर्षों से बचने का विकल्प चुन सकते हैं।

7)      नौकरशाही जड़ता: स्थापित राजनीतिक प्रणालियों में, नौकरशाही और संस्थागत जड़ता कुछ मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई में बाधा बन सकती है।

8)      पक्षपातपूर्ण राजनीति: अत्यधिक ध्रुवीकृत राजनीतिक वातावरण में, राजनेता उन मुद्दों को नजरअंदाज कर सकते हैं जो उनकी पार्टी की विचारधाराओं या लक्ष्यों से मेल नहीं खाते हैं।

हालांकि ऐसे उदाहरण हो सकते हैं जहां राजनेता मुद्दों को नजरअंदाज करते दिखते हैं, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक परिदृश्य जटिल है। मुद्दों की अनदेखी की धारणा व्यक्तिगत दृष्टिकोण और राजनीतिक निर्णयों की मीडिया कवरेज के आधार पर भिन्न हो सकती है। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना और पारदर्शिता और सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना नागरिकों की चिंताओं को दूर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि विविध प्रकार के मुद्दों पर ध्यान और विचार किया जाए।

logo
NewsCrunch
news-crunch.com