मानसून 2026: एक हाथ से सुखाया तो दुसरे हाथ से भिगोया

मानसून 2026 सामान्य से 12.6% कम रहा। इस औसत के बावजूद पूर्वोत्तर में रिकॉर्ड सूखा तथा ओडिशा, यूपी और बिहार में बाढ़ जैसी विषमता दिखी।
मानसून  2026: एक हाथ से सुखाया तो दुसरे हाथ से भिगोया
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राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर मानसून, पर दशक का सबसे खराब नहीं

भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल देश ने अपनी दीर्घावधि औसत (एलपीए) का महज 87 प्रतिशत बारिश पाई, यानी 759.4 मिलीमीटर बनाम सामान्य 868.6 मिलीमीटर। यह आंकड़ा इसे 1901 के बाद का 13वां सबसे सूखा और 2001 के बाद का चौथा सबसे कमजोर मानसून बनाता है। देश की 36 मौसम उपविभागों में से 17 में बारिश की कमी दर्ज हुई, 18 में सामान्य बारिश हुई, जबकि सिर्फ एक उपविभाग में बारिश सामान्य से ज्यादा हुई। इस कमजोर मानसून के पीछे मुख्य वजह अल नीनो की स्थितियां रहीं, जिसकी चेतावनी मौसम विभाग ने सीजन शुरू होने से पहले ही दे दी थी।

पूर्वोत्तर भारत: 125 साल का सबसे सूखा सीजन

इस मानसून की सबसे गंभीर कहानी पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की रही। इस क्षेत्र में कुल 1,017.1 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य आंकड़ा 1,367.3 मिलीमीटर है, यानी करीब 25 से 26 प्रतिशत की भारी कमी। यह आंकड़ा 1901 में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र का सबसे कम मानसूनी बारिश वाला सीजन है। इनमें असम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय की स्थिति सबसे गंभीर रही, इन तीनों राज्यों में मानसून के चारों महीने, यानी जून से सितंबर तक, लगातार कम बारिश दर्ज हुई। मणिपुर और मिजोरम में भी समूचे सीजन में बारिश की कमी रही। दुनिया में सर्वाधिक वर्षा क लिए मशहूर मेघालय की स्थिति देश में सबसे चिंताजनक रही, जहां सबसे ज्यादा 59 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज हुई। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत भी पीछे नहीं रहा, वहां 24.3 प्रतिशत की कमी के साथ यह रिकॉर्ड पर चौथा सबसे सूखा मानसून सीजन रहा।

ओडिशा: अल नीनो के सामने अकेला अपवाद

इसके ठीक उलट, ओडिशा ने इस साल 1,484.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज की, जो सामान्य 1,150.2 मिलीमीटर से 29 प्रतिशत ज्यादा है, और 1901 के बाद राज्य की चौथी सबसे ज्यादा मानसूनी बारिश है। दिलचस्प बात यह है कि जून के अंत तक ओडिशा खुद भी करीब 47 प्रतिशत की कमी से जूझ रहा था, लेकिन बंगाल की खाड़ी में बनी लगातार कम दबाव प्रणालियों और गहरे दबाव क्षेत्रों, करीब चौदह ऐसी प्रणालियों, ने अगस्त तक स्थिति पूरी तरह पलट दी। राज्य के बौध जिले में सामान्य से सबसे ज्यादा, 70 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई, जबकि बालेश्वर में 1,907 मिलीमीटर के साथ राज्य की सबसे ज्यादा मात्रा में बारिश दर्ज हुई।

बंगाल की खाड़ी के तंत्र और नेपाल की बारिश का दोहरा असर

जहां देश का बड़ा हिस्सा सूखे से जूझ रहा था, सितंबर के आखिरी हफ्ते में बंगाल की खाड़ी में एक गहरा दबाव क्षेत्र बना, जिसे मीडिया में व्यापक रूप से "चक्रवात अर्नब" कहा गया। स्पष्ट रहे कि मौसम विभाग ने तकनीकी रूप से इसे कभी औपचारिक रूप से नामित चक्रवाती तूफान घोषित नहीं किया, यह उत्तरी आंध्र प्रदेश-दक्षिण ओडिशा तट के पास कलिंगपट्टनम के निकट 23-24 सितंबर 2026 की रात को तट पार करने वाला एक गहरा दबाव तंत्र ही रहा, जो बाद में कमजोर पड़कर भीतरी इलाकों की ओर बढ़ा। इसी तंत्र और नेपाल की पहाड़ियों में हुई भारी बारिश के संयुक्त असर से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ सहित चौदह राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी करना पड़ा। उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, कई शहरों में लगातार लगभग साठ घंटे तक रुक-रुक कर बारिश हुई, राज्य में बारिश से जुड़ी घटनाओं में छप्पन से ज्यादा मौतें दर्ज हुईं और गंगा एक्सप्रेसवे का एक इंटरचेंज भी जलमग्न हो गया। इसी बारिश के चलते घाघरा, सरयू समेत कई नदियों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। लखीमपुर में एक मंदिर महज कुछ ही सेकंड में शारदा नदी में समा गया। बाराबंकी में 1100 साल पुराना बाबा नारायण दास मंदिर सरयू नदी में लटक गया। बहराइच में घाघरा नदी खतरे के निशान से करीब 70 सेंटीमीटर ऊपर बह रही थी, जिससे हजारों लोग प्रभावित हुए, नेपाल से लगातार बारिश और वहां के बैराजों से पानी छोड़े जाने को इसकी बड़ी वजह बताया गया। गोंडा में तटबंधों पर कटान शुरू हो गया।

फसलों पर कैसा असर

यह असमान बंटवारा खरीफ की फसलों पर सीधा असर डालेगा। पंजाब में धान की फसल पर दबाव बढ़ा है, हालांकि नहरी व ट्यूबवेल सिंचाई पर निर्भरता के चलते तात्कालिक नुकसान सीमित रह सकता है, पर आगे भूजल स्तर पर दबाव बढ़ने की आशंका है। असम, मेघालय, अरुणाचल जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में धान व बागवानी फसलों पर असर पड़ने की संभावना है, जहां खेती काफी हद तक वर्षा पर निर्भर है। दक्षिण भारत में कपास, मूंगफली, दलहन जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। दूसरी तरफ ओडिशा में अत्यधिक बारिश से धान की खड़ी फसल में जलभराव का खतरा बढ़ा है, और उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित बाराबंकी, लखीमपुर, बहराइच, गोंडा जैसे जिलों में धान व गन्ने की फसलें सीधे बाढ़ के पानी से बर्बाद हुई हैं। चूंकि मानसून देश के जलाशयों को रबी सीजन के लिए तैयार करता है, इसलिए कम बारिश वाले राज्यों में आने वाले समय में गेहूं, सरसों व चने की बुवाई के लिए सिंचाई लागत बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

आगे की राह

पहला कदम यह होना चाहिए कि पंजाब, दक्षिण भारत जैसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में रबी सीजन के लिए जलाशयों का पानी सोच-समझकर इस्तेमाल किया जाए, साथ ही सूक्ष्म सिंचाई यानी ड्रिप व स्प्रिंकलर तकनीक को बढ़ावा दिया जाए। दूसरा, पूर्वोत्तर जैसे वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दावों का तेजी से निपटारा जरूरी है, ताकि किसानों को समय पर राहत मिल सके। तीसरा, पूर्वोत्तर में बारिश की यह कमी कोई एक साल की घटना नहीं बल्कि मौसम विभाग के अपने अध्ययन के अनुसार एक दीर्घकालिक प्रवृत्ति है, 2020 के बाद से यहां लगातार बारिश घट रही है, इसलिए वहां जल संचयन ढांचों में दीर्घकालिक निवेश जरूरी है। चौथा, उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित जिलों में तटबंधों की तत्काल मरम्मत और फसल नुकसान के लिए मुआवजा जल्द वितरित किया जाना चाहिए। पांचवां, चूंकि मौसम विभाग ने अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भी अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है, इसलिए रबी की बुवाई की योजना क्षेत्रवार मिट्टी की नमी को ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिए, न कि राष्ट्रीय औसत के आधार पर। मानसून 2026 ने यह साफ कर दिया है कि भारत के लिए अब "औसत बारिश" का आंकड़ा काफी नहीं, जरूरत इस बात की है कि नीति-निर्माण क्षेत्रीय असमानता को ध्यान में रखकर हो।

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