उत्तराखंड के चमोली जिले में समुद्र तल से लगभग 15 हजार फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित हिमनद झील वसुंधरा ताल में राज्य का पहला सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। हिमनद झीलों के टूटने से पैदा होने वाले ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के खतरों की सटीक निगरानी और समय पर पूर्व चेतावनी जारी करने की दिशा में इस प्रणाली की स्थापना को एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है। 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस हिमनद झील की गहराई 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है, जबकि पूर्व के आंकड़ों और वर्तमान स्थिति के अनुसार झील के आकार में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला है।
इस अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) रुड़की द्वारा विकसित किया गया है। इस प्रणाली की स्थापना के लिए सीबीआरआई के साथ वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक विशेष दल 29 सितंबर को वसुंधरा ताल के लिए रवाना हुआ था, जो इस अत्याधुनिक प्रणाली को सफलतापूर्वक स्थापित करने के बाद मंगलवार को देहरादून लौट आया है।
वैज्ञानिकों की टीम द्वारा वसुंधरा ताल में एक विशेष 'ऑल-इन-वन' मौसम सेंसर लगाया गया है, जो हवा की गति, हवा की दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान और वायुदाब से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े निरंतर मापेगा। यह उन्नत सेंसर झील के जलस्तर और आसपास होने वाले हिमस्खलन की भी 24 घंटे निगरानी करेगा। इस तकनीक के माध्यम से किसी भी प्राकृतिक आपदा या जलस्तर में अचानक उतार-चढ़ाव की स्थिति में समय रहते सटीक सूचनाएं प्राप्त होंगी, जिससे निचले इलाकों में सुरक्षा उपाय मजबूत करने में बड़ी मदद मिलेगी।