30 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश काडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी दिव्या मित्तल ने तेरह साल की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया। 2013 बैच की यह अधिकारी उस समय राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर थीं, इससे पहले देवरिया , मिर्जापुर आदि जिलो की जिलाधिकारी रह चुकी थीं, मिर्जापुर में उनका वहां की सांसद और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के साथ उनके मतभेद की खबरें भी सामने आई थीं। लंदन की नौकरी छोड़कर सिविल सेवा में आई दिव्या मित्तल का इस्तीफा उस वक्त भी चर्चा का विषय बना था, और अब 29 सितम्बर को उन्होंने साफ कर दिया कि वे राजनीति में उतर रही हैं, हालांकि फिलहाल किसी दल से जुड़ने की बात से इनकार किया है। चर्चा है कि वे मिर्जापुर से ही अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर सकती हैं, जहां वे बतौर जिलाधिकारी बेहद लोकप्रिय रही हैं, इन्हें मिर्जापुर की “जनता का डीएम” कहती थी ।
दिव्या मित्तल का यह कदम एक पुराने और हमेशा प्रासंगिक बने रहने वाले सवाल को फिर सामने ले आया है, क्या सिविल सेवा के अनुभवी अधिकारियों को राजनीति में आना चाहिए, और अगर आते हैं तो क्या यह बदलाव जनता के लिए फायदेमंद साबित होता है ?
यह कोई नया चलन नहीं
प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आने वालों की सूची लंबी है और इसके नतीजे भी अलग अलग रहे हैं। यशवंत सिन्हा एक समय आईएएस अधिकारी थे, बाद में राजनीति में आए और देश के वित्त मंत्री तथा विदेश मंत्री तक बने, प्रशासनिक अनुभव को नीति निर्माण में ढालने की उनकी क्षमता को व्यापक रूप से सराहा गया। इसी तरह बिहार काडर के आईएएस रहे आर के सिंह प्रशासनिक सेवा में गृह सचिव जैसे बड़े पदों पर रहने के बाद राजनीति में आए और वर्षों तक केंद्रीय मंत्री रहे, ऊर्जा मंत्रालय में उनके कार्यकाल को अपेक्षाकृत सफल माना जाता है। वर्तमान में रेलवे और सुचना एवं प्रशारण मंत्री अश्वनी वैष्णव ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी रह चुके है, और उनका पूर्व का प्रशाशनिक अनुभव उनके मंत्री पद के दाइत्व को निभाने में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहा है ।
लेकिन हर कहानी इतनी सीधी नहीं रही। बिहार में हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में आईएएस और आईपीएस अधिकारी राजनीति में उतरे हैं, इनमें से कितनों को दीर्घकालिक राजनीतिक सफलता मिलेगी, यह अभी समय ही बताएगा; कश्मीर के हालात को लेकर इस्तीफा देने वाले शाह फैसल, जो अपने बैच के टॉपर रहे थे, ने अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन वह प्रयोग बहुत सीमित सफलता ही पा सका, और बाद में हालात ऐसे बने कि उन्हें अपनी राजनीतिक राह से पीछे हटना पड़ा।
लोकप्रियता और जवाबदेही, दोनों अलग चीजें हैं
यहीं पर एक जरूरी फर्क समझना जरूरी है। जिलाधिकारी या किसी भी प्रशासनिक पद पर रहते हुए लोकप्रिय होना, जनता से सीधा संवाद बनाना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और मीडिया में सकारात्मक छवि बनाना, यह एक बात है। लेकिन राजनीति में जाकर चुनाव जीतना, जनप्रतिनिधि के तौर पर जवाबदेह होना, गठबंधन और सदन की राजनीति साधना, तथा जमीन पर उतरकर वादों को पूरा करना और वास्तविक न्याय दिलाना, यह बिल्कुल अलग कौशल मांगता है। एक अच्छा अधिकारी होने का मतलब यह नहीं कि वह अच्छा राजनेता भी साबित होगा, क्योंकि प्रशासन में निर्णय लेने का अधिकार और सुरक्षा दोनों होती है, जबकि राजनीति में हर फैसला जनता की सीधी कसौटी पर परखा जाता है और असफलता की कीमत तुरंत चुकानी पड़ती है।
दिव्या मित्तल के मामले में भी यही देखा जाना बाकी है। मिर्जापुर, देवरिया आदि जिलो की जिलाधिकारी के तौर पर उनकी सक्रियता और सुलभता को लेकर अच्छी प्रतिष्ठा रही लेकिन एक जिलाधिकारी के पास प्रशासनिक मशीनरी, पुलिस बल और सरकारी संसाधनों का सीधा नियंत्रण होता है, जबकि एक राजनेता के तौर पर उन्हें यही सब कुछ जनता का भरोसा जीतकर, गठबंधन बनाकर और चुनावी प्रक्रिया से गुजर कर हासिल करना होगा। खुद मित्तल ने भी अपने एक बयान में यह संकेत दिया कि राजनीति में आने का मकसद कोई पद हासिल करना नहीं, बल्कि जमीनी मुद्दों, जैसे किसी गांव में कक्षा पांच से आगे स्कूल न होने जैसी समस्याओं, को हल कराना है। यह मंशा अच्छी हो सकती है, पर मंशा और उसे व्यवहार में बदल पाने की क्षमता के बीच का फासला ही असली परीक्षा होती है।
निष्कर्ष
सिविल सेवा से राजनीति में आना न तो पूरी तरह गलत कदम है और न ही अपने आप में सफलता की गारंटी। यशवंत सिन्हा ,अश्वनी वैष्णव और आर के सिंह जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि प्रशासनिक अनुभव सही राजनीतिक समझ के साथ मिलकर बेहतर नीति निर्माण में बदल सकता है, वहीं अन्य मामले यह चेतावनी भी देते हैं कि लोकप्रियता, सदाशयता या यहां तक कि पुरस्कार पाई हुई प्रशासनिक सेवा भी राजनीति में सफलता या नैतिक आचरण की गारंटी नहीं बनती। दिव्या मित्तल एक सक्षम और चर्चित अधिकारी रही हैं, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी, जब उन्हें प्रशासनिक कुर्सी के बजाय जनता के बीच खड़े होकर भरोसा जीतना होगा, और वादों को केवल नीयत तक नहीं बल्कि नतीजों तक पहुंचाना होगा। यही वह कसौटी है जिस पर अंततः हर पूर्व अधिकारी से नेता बने व्यक्ति को परखा जाता है।