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संघ का नया स्वरूप

शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सांगठनिक ढांचे में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौवें वर्ष में प्रवेश करते ही सांगठनिक स्तर पर एक युगांतकारी परिवर्तन की योजना बना रहा है। प्रयागराज से सामने आई सूचनाओं के अनुसार, संघ अब अपने दशकों पुराने ढांचे को केंद्र सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने की तैयारी में है। इस नए बदलाव का मुख्य उद्देश्य काम के आधार को बिल्कुल जमीनी स्तर तक ले जाना और सांगठनिक कामकाज को पहले से अधिक प्रभावी और चुस्त-दुरुस्त बनाना है। पिछले तीन वर्षों से इस मसौदे पर गहन मंथन चल रहा है।

इस नई योजना के तहत अब 'प्रांत' की जगह 'राज्य' और 'संभाग' की व्यवस्था प्रभावी होगी। वर्तमान में जहां संघ के अपने अलग प्रांत हैं, वहीं अब केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित राज्य ही संघ की इकाई होंगे। देश भर में लगभग 28 से 29 राज्य प्रचारक नियुक्त किए जाएंगे। उनके सहयोग के लिए 'संभाग प्रचारक' की नई भूमिका तय की गई है। संभाग प्रचारकों का कार्यक्षेत्र वर्तमान प्रांत प्रचारकों की तुलना में छोटा और अधिक केंद्रित रहेगा, जिससे वे जमीनी स्तर पर गतिविधियों का संचालन बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

नए ढांचे के अनुसार, दो से तीन प्रशासनिक मंडलों (कमिश्नरी) को मिलाकर एक संभाग बनाया जाएगा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहाँ 18 मंडल हैं, वहां 9 संभाग बनाए जाने की योजना है। इसके साथ ही राज्य स्तर पर 'कार्यवाह' की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। इनका मुख्य दायित्व संघ और उसके विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय और सामंजस्य स्थापित करना होगा। यह कदम संगठनात्मक कामकाज की जटिलताओं को कम कर उसे अधिक परिणामोन्मुखी बनाने के लिए उठाया जा रहा है।

बदलाव की यह प्रक्रिया केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि 'क्षेत्र' की सीमाओं में भी बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा। वर्तमान में देशभर में संघ के 11 क्षेत्र प्रचारक कार्य कर रहे हैं, लेकिन नए ढांचे में इनकी संख्या घटकर 9 रह जाएगी। पूरे देश में लगभग 75 संभाग प्रचारक अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे। सांगठनिक दृष्टि से राजस्थान को उत्तर क्षेत्र के साथ जोड़ने का प्रस्ताव है, जबकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कार्यक्षेत्रों को भी नए सिरे से पुनर्गठित किया जा सकता है।

संगठनात्मक ढांचे के साथ-साथ संघ अपनी कार्यप्रणाली और बैठकों के स्वरूप को भी लचीला बना रहा है। अब तक प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली 'अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा' की बैठक अब तीन साल में एक बार आयोजित करने का सुझाव है, जो मुख्य रूप से नागपुर में होगी। शेष दो वर्षों में क्षेत्रीय स्तर पर बैठकें होंगी। मार्च 2026 में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इस पूरे मसौदे को आधिकारिक मंजूरी मिल सकती है, जिसके बाद इसे पूर्णतः लागू कर दिया जाएगा। 

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