Economy

क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध की ओर आरबीआई का बढ़ता झुकाव

वित्तीय स्थिरता और टैक्स चोरी के बढ़ते खतरों को देखते हुए देश में डिजिटल संपत्तियों पर लग सकती है पूरी तरह रोक।

भारत में क्रिप्टोकरेंसी के भविष्य को लेकर नीतिगत अनिश्चितता के बादल एक बार फिर गहरे हो गए हैं। देश की दो सबसे बड़ी नियामक और वित्तीय संस्थाएं—भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और आयकर विभाग—क्रिप्टो संपत्तियों को लेकर अपने रुख में अत्यधिक सख्त हो गई हैं। सरकारी दस्तावेजों के हवाले से सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए देश में क्रिप्टोकरेंसी पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की वकालत की है। भले ही सरकार ने अब तक इस पर कोई अंतिम औपचारिक नीति लागू नहीं की है, लेकिन देश की प्रमुख वित्तीय एजेंसियां इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि बिना किसी ठोस नियमन के चल रहा यह कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने विशेष रूप से वाणिज्यिक बैंकों और वित्तीय संस्थानों को आगाह किया है कि वे क्रिप्टो संपत्तियों के साथ-साथ निजी तौर पर जारी किए जाने वाले स्टेबलकॉइन्स में किसी भी प्रकार का निवेश, ट्रेडिंग या व्यावसायिक एक्सपोजर रखने से पूरी तरह परहेज करें। आरबीआई का मानना है कि यदि इस आभासी मुद्रा को देश के मुख्य वित्तीय और बैंकिंग तंत्र में प्रवेश की अनुमति मिलती है, तो यह पारंपरिक बैंकिंग स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। हालांकि वर्ष 2018 में माननीय न्यायालय द्वारा केंद्रीय बैंक के पिछले प्रतिबंधों को रद्द किए जाने के बाद से क्रिप्टो बाजार एक ग्रे ज़ोन में काम कर रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में बढ़ते जोखिमों को देखते हुए वित्तीय संस्थाएं इसे पूरी तरह से नियमन व्यवस्था से बाहर रखने के पक्ष में आ गई हैं।

कराधान और कर चोरी के मोर्चे पर भी आयकर विभाग ने बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में इस समय लगभग 3.9 करोड़ क्रिप्टो निवेशक हैं, जिनके पास मई के अंत तक करीब 20 हजार करोड़ रूपए (लगभग 2.1 अरब डॉलर) की डिजिटल संपत्ति मौजूद थी। टैक्स विभाग की गहन जांच में सामने आया है कि मार्च 2023 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में लेनदेन करने वाले लगभग 6.45 लाख लोगों में से 25 प्रतिशत से भी कम निवेशकों ने अपने टैक्स रिटर्न में इसकी सही जानकारी दी थी। चूंकि विदेशी एक्सचेंजों और निजी डिजिटल वॉलेट्स के माध्यम से होने वाली इस ट्रेडिंग के वास्तविक मालिकों की पहचान करना और उनके वित्तीय लेनदेन को ट्रैक करना बेहद जटिल है, इसलिए भारत सरकार द्वारा क्रिप्टो मुनाफे पर लगाए जाने वाले 30 प्रतिशत टैक्स की वसूली करना अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्राओं से समर्थित स्टेबलकॉइन्स को देश की आर्थिक और मौद्रिक स्वतंत्रता के लिए एक नया और गंभीर खतरा घोषित किया है। आरबीआई के अनुसार, यदि विदेशी करेंसी पर आधारित इन स्टेबलकॉइन्स के बड़े पैमाने पर उपयोग को बढ़ावा मिलता है, तो निवेशकों को अपनी होल्डिंग्स को पारंपरिक भारतीय मुद्रा में बदलने की आवश्यकता कम हो जाएगी, जिससे क्रिप्टो से होने वाले मुनाफे को खोजना और उस पर कर लगाना लगभग असंभव हो जाएगा। साथ ही, रुपये समर्थित स्टेबलकॉइन्स के आने से भी पारंपरिक मुद्रा जारी करने से होने वाले सरकारी राजस्व में भारी कमी आ सकती है और बाजार में तनाव के समय देश की वित्तीय संप्रभुता को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। वैश्विक स्तर पर जहां चीन ने इस पर पूरी तरह रोक लगाई है और जापान जैसे देश नियमन की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं भारत सरकार अब वैश्विक आर्थिक स्थिरता, उपभोक्ता हितों और देश की मौद्रिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक सख्त और दूरगामी नीतिगत निर्णय लेने की तैयारी में है।

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